19th Day । सामाजिक विज्ञान

आपको मध्य प्रदेश प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा हेतु सामाजिक विज्ञान विषय की इकाई-18, इतिहास के इन महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तारपूर्वक जानकारी प्रदान की गई है।

इकाई - 18: इतिहास - राजपूतों का उदय और मुस्लिम आक्रमण
हर्षवर्धन की मृत्यु (लगभग 647 ई.) के बाद, उत्तर भारत में एक केंद्रीय शक्ति का अभाव हो गया। इस राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर कई छोटे-छोटे राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों पर शासन करने वाले शासकों को 'राजपूत' कहा गया। 'राजपूत' शब्द संस्कृत के 'राजपुत्र' से निकला है, जिसका अर्थ है 'राजा का पुत्र'। ये शासक प्रायः क्षत्रिय वर्ण से संबंधित थे और उनकी वीरता, शौर्य और स्वाभिमान के लिए जाने जाते थे।

राजपूतों के उदय के प्रमुख कारण:

  • हर्षवर्धन के साम्राज्य का पतन: केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने से क्षेत्रीय शासकों ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।
  • सामंतवाद का विकास: बड़े राजाओं के अधीन काम करने वाले सामंतों ने अपनी शक्ति बढ़ाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित किए।

आइए, इन प्रमुख राजपूत वंशों को विस्तार से समझते हैं।

  1. गुर्जर-प्रतिहार (Gurjara-Pratihara)
  • उदय: आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में। इनका शासन मुख्यतः पश्चिमी भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में केंद्रित था।
  • संस्थापक: नागभट्ट प्रथम को इस वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • प्रमुख शासक:
    • नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.): इन्होंने अरबों के आक्रमण को सफलतापूर्वक रोका, जिससे इनकी शक्ति बढ़ी।
    • मिहिर भोज (836-885 ई.): इन्हें इस वंश का सबसे प्रतापी शासक माना जाता है। इनके समय में प्रतिहार साम्राज्य अपनी चरमोत्कर्ष पर था। इनकी राजधानी कन्नौज थी। अरबी यात्री सुलेमान ने इनकी शक्ति और समृद्धि का वर्णन किया है।
  • शासन क्षेत्र: इनका साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में बंगाल से पश्चिम में सिंध तक फैला हुआ था।
  • महत्व: इन्होंने लगभग 300 वर्षों तक अरबों के आक्रमणों से भारत की रक्षा की, जिससे भारत की संस्कृति और सभ्यता सुरक्षित रही।
  1. चंदेल (Chandela)
  • उदय: नवीं शताब्दी के प्रारंभ में। ये पहले गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत थे, बाद में स्वतंत्र हो गए।
  • संस्थापक: नन्नुक को इस वंश का संस्थापक माना जाता है।
  • प्रमुख शासक:
    • धंगदेव (950-1002 ई.): इनके समय में चंदेल वंश अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। इन्होंने खजुराहो के अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें कंदरिया महादेव मंदिर प्रमुख है।
    • विद्याधर (1019-1029 ई.): इन्होंने महमूद गजनवी के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया।
  • राजधानी: खजुराहो और महोबा।
  • महत्व: चंदेल शासकों का मुख्य योगदान कला और स्थापत्य के क्षेत्र में है। खजुराहो के मंदिर अपनी कामुक मूर्तिकला और वास्तुकला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
  1. राष्ट्रकूट (Rashtrakuta)
  • उदय: आठवीं शताब्दी के मध्य में। इनका शासन मुख्यतः दक्कन (Deccan) क्षेत्र में था।
  • संस्थापक: दंतिदुर्ग (735-756 ई.)।
  • प्रमुख शासक:
    • अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.): ये एक महान विद्वान और कला प्रेमी शासक थे। इन्होंने 'कविराजमार्ग' नामक ग्रंथ की रचना की।
    • कृष्ण तृतीय (939-967 ई.): इनके समय में राष्ट्रकूटों की शक्ति अपनी चरम सीमा पर थी।
  • राजधानी: मान्यखेत (आधुनिक मालखेड़)।
  • महत्व:
    • इन्होंने एलोरा के कैलाश मंदिर और एलिफेंटा की गुफाओं का निर्माण करवाया।
    • ये गुर्जर-प्रतिहारों और पालों के साथ "त्रिपक्षीय संघर्ष" में शामिल थे, जिसका मुख्य उद्देश्य कन्नौज पर अधिकार करना था।
  1. परमार (Paramara)
  • उदय: दसवीं शताब्दी के प्रारंभ में। ये मुख्यतः मालवा क्षेत्र में शासन करते थे।
  • संस्थापक: उपेंद्र (कृष्णराज) को इस वंश का संस्थापक माना जाता है।
  • प्रमुख शासक:
    • भोज (1010-1055 ई.): इन्हें इस वंश का सबसे प्रतापी और विद्वान शासक माना जाता है। वे स्वयं एक कवि, लेखक और विद्वान थे। उन्होंने कई मंदिरों और विशाल तालाबों का निर्माण करवाया। धार (मध्य प्रदेश) में 'सरस्वती कंठाभरण' और 'समरांगण सूत्रधार' जैसे ग्रंथ उन्हीं के द्वारा लिखे गए माने जाते हैं।
  • राजधानी: धार और उज्जैन।
  • महत्व: परमारों ने साहित्य, कला और स्थापत्य को खूब बढ़ावा दिया। राजा भोज को 'कविराज' की उपाधि भी मिली थी।
  1. चौहान (Chauhan)
  • उदय: दसवीं शताब्दी में। इनका शासन मुख्य रूप से राजस्थान और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में था।
  • संस्थापक: वासुदेव चौहान को इस वंश का संस्थापक माना जाता है।
  • प्रमुख शासक:
    • पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177-1192 ई.): ये इस वंश के सबसे प्रसिद्ध और अंतिम प्रतापी शासक थे।
  • राजधानी: अजमेर और दिल्ली।
  • महत्व:
    • इन्होंने तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मुहम्मद गौरी को हराया था।
    • तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया और भारत में मुस्लिम शासन की नींव रखी।
    • पृथ्वीराज चौहान की वीरता और प्रेम कहानी (संयोगिता के साथ) लोक कथाओं और पृथ्वीराज रासो जैसे ग्रंथों में प्रसिद्ध है।

मुस्लिम आक्रमण
राजपूत राज्यों के आपसी संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर मुस्लिम शासकों ने भारत पर आक्रमण किए।

  1. अरबों का आक्रमण (712 ई.)
  • आक्रमणकारी: मुहम्मद-बिन-कासिम।
  • कारण: सिंध के शासक दाहिर के खिलाफ समुद्री लुटेरों का मुद्दा।
  • परिणाम: कासिम ने सिंध पर कब्जा कर लिया, लेकिन यह आक्रमण भारत के आंतरिक हिस्सों में ज्यादा नहीं फैल सका।
  1. तुर्कों का आक्रमण
  • महमूद गजनवी (1000-1027 ई.):

    • आक्रमण: उसने भारत पर 17 बार आक्रमण किया।
    • कारण: उसका मुख्य उद्देश्य भारत की धन-संपदा लूटना था, न कि स्थायी साम्राज्य स्थापित करना।
    • प्रमुख आक्रमण: 1025 ई. में गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण।
    • प्रभाव: इन आक्रमणों ने भारत की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया और राजपूतों की सैन्य कमजोरियों को उजागर किया।
  • मुहम्मद गौरी (1175-1206 ई.):

    • उद्देश्य: गजनवी के विपरीत, गौरी का उद्देश्य भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करना था।
    • तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.): गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ, जिसमें गौरी हार गया।
    • तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.): गौरी ने पूरी तैयारी के साथ पुनः आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहान को हराया। यह भारत के इतिहास में एक निर्णायक युद्ध था।
    • परिणाम: इस युद्ध के बाद दिल्ली पर गौरी का अधिकार हो गया और भारत में दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी। गौरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को भारतीय प्रदेशों का गवर्नर बनाया, जिसने बाद में गुलाम वंश की स्थापना की।

यह जानकारी मध्य प्रदेश प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा हेतु उपयोगी है क्योंकि इसमें प्रमुख राजपूत वंशों, उनके शासकों, कलात्मक योगदानों और मुस्लिम आक्रमणों के महत्वपूर्ण तथ्यों को शामिल किया गया है।




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