🔥 विश्वगुरु की ओर भारत: ग्लोबल साउथ की आवाज़ और नई विश्व व्यवस्था
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भारत, जो कभी उपनिवेशवाद का शिकार था, आज वैश्विक राजनीति में एक नई शक्ति के रूप में उभर रहा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों—जिन्हें सामूहिक रूप से ग्लोबल साउथ कहा जाता है—के बीच भारत का प्रभाव अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। यह केवल आर्थिक या राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक पुनर्जागरण है, जहाँ भारत इन देशों की वास्तविक आवाज़ बनकर उभरा है।
ग्लोबल साउथ क्या है?
ग्लोबल साउथ वह समूह है जिसमें वे देश शामिल हैं जो आर्थिक रूप से कम विकसित हैं, उपनिवेशवाद का इतिहास साझा करते हैं, और गरीबी, जलवायु परिवर्तन व स्वास्थ्य जैसी साझा समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत स्वयं इन चुनौतियों से उभरकर आज इन देशों के लिए सबसे भरोसेमंद विकास भागीदार बन चुका है।
🇮🇳 भारत की नेतृत्वकारी भूमिका के चार प्रमुख स्तंभ
1. रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक संतुलन
भारत किसी शक्ति गुट का हिस्सा बने बिना अमेरिका, रूस और यूरोपीय देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखता है। इसी वजह से यह संघर्षरत देशों के लिए एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में उभरा है।
G20 अध्यक्षता (2023) के दौरान भारत ने ग्लोबल साउथ को वैश्विक एजेंडा के केंद्र में ला दिया। अफ्रीकी संघ (African Union) को G20 में स्थायी सदस्य बनवाना भारत की ऐतिहासिक जीत थी।
2. कर्ज-जाल मुक्त विकास सहयोग
भारत का सहयोग चीन के BRI की तरह कर्ज-जाल आधारित नहीं है। यह साझेदारी पारदर्शी, मानवीय और बिना शर्त होती है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) — आधार, UPI, Co-WIN — आज 40+ देशों में भारत मॉडल के रूप में लागू हो रहे हैं।
3. वैश्विक मंचों पर न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की मांग
भारत UNSC, IMF और World Bank में सुधारों की वकालत करता है ताकि विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व मिले। BRICS+ विस्तार और SCO जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता नए बहुध्रुवीय विश्व-क्रम का संकेत है।
4. भारत की सॉफ्ट पावर: संस्कृति + योग + मानवीय नेतृत्व
कोविड दौर में भारत ने वैक्सीन मैत्री के तहत 150+ देशों को दवाइयाँ भेजीं— जिसने भारत को “विश्व-बंधु” की पहचान दिलाई। योग, आयुर्वेद और 3 करोड़ भारतीय प्रवासी भी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को सशक्त करते हैं।
⚡ भारत के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
| चुनौती | विवरण |
|---|---|
| चीन की प्रतिस्पर्धा | BRI और भारी निवेश के कारण चीन का वर्चस्व भारत के लिए चुनौती है। |
| आंतरिक असमानता | ऑक्सफैम रिपोर्टों में दर्शाई आर्थिक व सामाजिक असमानताएँ भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। |
| हितों की विविधता | ग्लोबल साउथ के देशों के अलग-अलग उद्देश्यों के कारण सामूहिक रुख बनाना कठिन है। |
| विकास फंडिंग की कमी | चीन की तुलना में भारत की वित्तीय क्षमता सीमित है। |
🌟 आगे की राह: भारत एक समाधान प्रदाता
ISA (International Solar Alliance) और Global Biofuel Alliance भारत को वैश्विक ऊर्जा-परिवर्तन के नेता के रूप में स्थापित कर रहे हैं। इन पहल से जलवायु परिवर्तन की साझी चुनौतियों का समाधान खोजने में मदद मिलेगी।
🏁 निष्कर्ष: विश्वगुरु की ओर भारत
भारत अब केवल ग्लोबल साउथ का भागीदार नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बन चुका है। इसका संदेश स्पष्ट है—
“विकास सबका, नेतृत्व सबका और समाधान भी सबके साथ।”
Mission 2030 की दिशा में भारत एक न्यायपूर्ण, समावेशी और मानवीय नई विश्व व्यवस्था का निर्माण कर रहा है— जहाँ ग्लोबल साउथ की आवाज़ को वास्तविक स्थान मिलेगा। यही भारत के विश्वगुरु बनने की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

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